Book Review: Kabze Jama by Shamsur Rahman Faruqi

छोटी सी 140 पेज की किताब, ज़्यादातर उपन्यासकारों की इतनी छोटी से किताब आप ज़्यादा से ज़्यादा 5-6 घंटे में कर देंगे खत्म, लेकिन मुझे 2 दिन लगे इसे पढ़ने में। फारूकी साहब की किताब उस सिंगल् माल्ट व्हिस्की की तरह होती है जो जब आप मुँह में ले कर उसे घुमाते हैं, तो उसका ज़ायका और सुरूर धीरे धीरे आप पर खुलता जाता है..आप पढ़ते हैं और शब्द अनायास ही चित्र बन कर आपके आंखों के सामने दौड़ने लगता है!

किस्सागोई के अंदाज़ में लिखी गयी ये किताब सोलहवीं और अठारवीं सदी का सामाजिक और सांस्कृतिक चित्रण है (कुछ हद तक राजनैतिक भी). किताब का मुख्य पात्र इब्राहिम लोधी के काल का एक सिपाही है जो जब अपनी बेटी का निकाह कराने के लिए देहली से अपने गांव नंगल खुर्द के लिए निकलता है, तो रास्ते में ही लूट लिया जाता है। टूटा हुआ और परेशां जब वो देहली वापस लौटता है, तो उसका दोस्त उसे ये बताता है कि एक तवायफ अमीर जान गरीबों की मदद करती है और शायद तुम्हारी भी मदद करे..वो दोनों उसके पास पहुंचते हैं और वाकई वो उसको 350 तनखे कर्ज़ दे देती है। सिपाही अपने बेटी की शादी करवाता है और 3 साल अपनी कमाई जोड़ कर कर्ज़ की रकम मुकम्मल कर लेता है। कर्ज़ लौटने जब वो वापस अमीर जान की हवेली पहुंचता है, तो उसे पता चलता है कि अमीर जान का इंतेक़ाल हो चुका है। इस गरज़ से की जिसने उसकी मदद की उसके कब्र पे फातेहा ही पढ़ आये, वो जब उसके मज़ार पे पहुंचता है तो देखता है कि कब्र में एक दरवाज़ा है और अंदर से रौशनी आ रही है। अनायास ही वो कब्र के अंदर दाखिल हो जाता है….और अरेबियन नाईट सरीखे फिर खुलती है एक तिलिस्मी दुनिया…टाइम ट्रेवल….वो पहुंच जाता है 250 बरस आगे…सीधे मुग़ल बादशाह मुहम्मद शाह के ज़माने में! फिर पढ़ते जाइये और आखों के सामने देखिये उस समय की देहली….उसका समाज, रहन सहन, लिबास, उसके शुगल, बाज़ार और उसकी संस्कृति…!

ये किताब पढ़ के आपको साफ समझ में आ जायेगा कि क्यों फ़ारूक़ी साहब ये कभी मानने को तैयार नही हुए उन इतिहासकारों का कहना, की देहली अपनी ज़िंदगी में कभी भी पूरी तरह से उजड़ गयी थी!

बेहतरीन किताब!

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