Book Review : Paltu Bohemian; Prabhat Ranjan पुस्तक समीक्षा: पालतू बोहेमियन; प्रभात रंजन

 

वैसे तो मैं बड़े चाव से “मुस्लिम्स अगेंस्ट मुस्लिम लीग” पढ़ रहा था, लगभग आधी से ज़्यादा किताब खत्म भी कर दी थी, फिर देखा कि  प्रभात भाई की ये किताब किंडल में मिलने लगी थी…तुरंत आज सुबह खरीदा और ‘छूटती कहाँ है ये मूंह से लगी हुई’ अंदाज़ में खत्म कर के ही उठा। और जल्दी खत्म हो जाती, पर बीच बीच में पढ़ते पढ़ते सो जाता था। लगता है लू लग गया है, बुखार भी है थोड़ा और शरीर दर्द भी कर रहा है। ऐसे में इस तरह की किताबें मनःस्थिति ठीक रखने का अच्छा ज़रिया बन जाती हैं। प्रभात भाई की लेखनी का मैं कायल हूँ, इसलिए नहीं कि वो मेरे कॉलेज के सहपाठी थे, बल्कि इसलिए के वो वाकई बहुत अच्छा लिखते हैं। उनकी लिखाई में एक सहजता है, ऐसा लगता है कि लेखक आपसे बात कर रहा हो। अगर किताब के दायरे से थोड़ा हट कर उनकी लेखनी की बात करें तो मेरे हिसाब से आज के ‘इंटेलचतुलता’ (इसी किताब से एक शब्द चुरा रहा हूँ) ग्रसित लेफ्ट लिबरल ब्रिगेड को उनकी लेखनी से सीख लेनी चाहिए, जिनकी लेखनी ऐसी लगती है जैसे वो पाठक से संवाद नहीं कर रहे, सीख दे रहे हों। ऐसी रचनाओं को पढ़कर वही बात बार बार याद आ जाती है, जो शायद दिल्ली के किसी शराबघर में मैंने एक पोस्टर में पढ़ा था, “कृपया यहां ज्ञान न दें, यहां सब ज्ञानी हैं!”

चलिए रचना शैली की बात तो हो गयी, अब किताब पर वापस लौट आया जाए, ये पुस्तक एक संस्करण है, प्रभात भाई के उनके गुरु (यही कहना उचित होगा) मनोहर श्याम जोशी के साथ बिताए हुए उनके समय का..और मैं कहूँ तो एक श्रधांजलि भी है उनको। साथ में उस पालतू बोहेमियन के साथ एक ‘अ-पालतू बोहेमियन’ भी है, प्रभात भाई के रूप में इस कहानी में, अर्रे भई, उस इंसान को और क्या कहेंगे जो शादी के बाद भी लगी लगाई नौकरी छोड़ के वर्धा से ट्रेन पकड़ के दिल्ली निकल ले?

ये पुस्तक है तो 109 पन्नों की ही (और भी छोटी अगर 17 पेज की प्रस्तावना हटा दें, सच कहूं तो ये थोड़ा जारिंग ही लगा, पुष्पेश जी की लिखी प्रस्तावना में मनोहर श्याम जोशी शशि कपूर बन जाते हैं, अमिताभ बच्चन उनकी पारिवारिक गाथा ही है, पुष्पेश जी बड़े बुद्धिजीवी हैं, इस छोटे समीक्षक को माफ करेंगे), लेकिन किसी को लेखनी सीखनी हो तो इस किताब को बार बार पढ़े..लिखने के लिए शोध और पढ़ाई कितनी ज़रूरी होती है, भाषा का गठन, शब्दों का सही चुनाव जाने कितने ही रहस्य प्रभात भाई ने इस किताब में खोल दिये हैं।

और एक चीज़, आज भी दिल में एक टीस छोड़ जाती है, की लेक्चरर बनने की प्रक्रिया कितनी घाल मेल भरी रही है हिंदुस्तान में। मैं खुद जानता था कि आप DU में मेरे विभाग में पढ़ाने का सपना कभी नहीं देख सकते थे, जब तक आप मार्क्सवादी चोला न ओढ़ ले, या फिर रणधीर सिंह के चेले न हों! मैं इसी किताब से से ‘चेला’ शब्द ‘उठा’ कर परिभाषित कर रहा हूँ, ‘शिष्य’ शब्द नहीं इस्तेमाल कर रहा हूँ। यही माहौल था जिसने हम जैसे कई लोगों को सिविल सर्विसेज परीक्षा की ओर धकेला और बाबू बना दिया। दुख बहुत हुआ जब प्रभात भाई ने लिखा, ‘आज भी’!

प्रभात भाई को इतनी बेहतरीन रचना लिखने पे बधाई! ऐ भई, कोठागोई की साइंड कॉपी मिली नहीं मुझे, (आपने वादा किया था, शायद भूल गए), इसकी मिलेगी क्या, ऐसा उनसे पुछा था, और उन्होंने साइंड कॉपी भेजवा दी. तस्वीर साझा कर रहा हूँ नीचे. प्रभात भाई का तहे दिल से शुक्रिया!


Book Review: Kasap – Manohar Shyam Joshi पुस्तक समीक्षा: कसप – मनोहर श्याम जोशी

अब इस कालजयी रचना की रिव्यू क्या लिखूँ मैं? हिंदी साहित्य में जिसकी भी ज़रा भी अभिरुचि होगी, क्या नहीं पढ़ी होगी उसने ये किताब? क्या नहीं जानते होंगे लोग इसके कथानक को? क्या नहीं आयी होगी एक साथ उनके चेहरे पे मुस्कान और आँखों में नमी, इस उपन्यास को पढ़कर? सो ज़्यादा कुछ नहीं कहूँगा, बस इतना ही की, क्या उपन्यास है यार!

वैसे तो इसे आसान लफ़्ज़ों में संज्ञातीत करना हो तो यही कहेंगे के एक असफल प्रेम कहानी है, पर मेरे हिसाब से ये पुस्तक उससे कहीं ज़्यादा है, कई चीज़ों को इंगित करती हुई..प्रेम तो पुस्तक के सेंटर में रचा बसा है ही, और आपका इस प्रेम सम्बंध को देखने का अपना अपना नज़रिया हो सकता है..वो कहते हें ना, ‘इश्क़ की दास्तान है प्यारे, अपनी अपनी ज़ुबान है प्यारे..’! सो आप इसको अपने परिष्कृत नज़रिये से देखिए या फिर भदेश से, आपकी मर्ज़ी..सो जिन लोगों ने नहीं पढ़ी, उनको बताता चलूँ के ये कहानी है अनाथ, सुशील, सहित्यनिषट्, कथाकार, उपन्यासकार, देवदत्त उर्फ़ डीडी की जो बॉम्बे फ़िल्म जगत में अपनी पैठ बनाने की कोशिश कर रहा है, और अल्हड़, खिलंदर, मस्तमौला बेबी उर्फ़ मैत्रेय की, उनके असफल प्रेम की…दोनो की मुलाक़ात होती है एक शादी के ज़नवासे में, और फिर नायक को एकदम से और नाइका को धीरे धीरे से, हँसी मज़ाक़ और खिलंदरी करते करते प्यार हो जाता है नायक से। जैसा अमूमन होता है, बेबी के परिवारवालों, ख़ास कर उसके भाई और भावज को बिलकुल ही नहीं भाता ये प्यार। लड़का अनाथ, कुछ ख़ास करता नहीं, खास आमदनी भी नहीं, भला ऐसे में कोई परिवारजनों पसंद करे भी तो कैसे? पर प्रेमी प्रेमिका कहाँ मानने वाले थे..उनकी ज़िद के आगे झुकना पड़ा बेबी के माता पिता को और तय हो गयी दोनो की शादी। पर फिर नायक पे सवार होती है धुन अमेरिका जा कर कुछ बनने की, और उसको अमेरिकी विश्वविद्यालय में दाख़िला ले कर आगे फ़िल्म बनाने की पढ़ाई करने को उत्प्रेरित करती है फ़्रांसीसी प्रडूसर गुलनार, जिसके साथ वो एक प्रोजेक्ट में काम कर चुका था। बेबी को उसके अमेरिका जाने की बात समझ में आती नहीं, खास कर के जब उसने उसे पा लिया है, उनकी ज़िन्दगी अब साथ गुजरने वाली है, एक हो कर! वो उसे रोकने की कोशिश करती है, पर असफल होने पर ख़त्म कर देती है उस से रिश्ता ! बेबी जिसने आपने आप को डि डि का व्याहता मान लिया था, अब अपने आप को विधवा मान बेबी से मैत्रेय, विदुषी मैत्रेय, बनने की राह पर अग्रसर हो जाती है, खो देती है अपने आप को किताबों और पठन पाठन में। मेरे हिसाब से कई रिश्ते इस अमेरिका जाने, कुछ नया बन जाने की बलि चढ़ गए हैं, और जब इंसान उस रिश्ते के ख़त्म होने के झंझावात से गुज़र रहा हो, वो रिश्ते जो उसने अटल और अमर मान लिए हों, जिसपर उसका यकीन से ज़्यादा विश्वास हो चला हो, ऐसे रिश्तों के खात्मे पे, किताबों और पठन पाठन में डूब जाना इस चित्त चिता की अग्नि को शमन करने का सबसे बेहतरीन तरीक़ा होता है…. एक तो किताबें एक नयी दुनिया खोल देती हैं, और समय भी अच्छा खासा खा जाती हैं आपका ….

वैसे, क्या जो भी फैसले उन दोनों ने लिए, वो सुख दे पाए दोनों को, इसका जवाब ही है उपन्यास का शीर्षक, ‘कपस’….एक कुमाऊनी शब्द, जिसका अर्थ है, ‘क्या मालूम!’ मनोहर श्याम जोशी जी ने इस उपन्यास के शीर्षक के बारे में लिखा था, ‘.. पर इस कथा के जो भी सूझे मुझे विचित्र शीर्षक सूझे। कदाचित इसलिए कि इस सीधी-सादी कहानी के पात्र सीधा-सपाट सोचने में असमर्थ रहे।”

वैसे यह किताब सिर्फ बेबी और डी डी की प्रेम कहानी ही नहीं है, यह कुमाऊनी समाज, उसके रहन सहन का एक आइना भी है.. उपन्यास की भाषा मूलतः कुमाऊनी ही है, और यह कहते मुझे कोई झिझक नहीं हो रही की रेणु के मैला आँचल के बाद यह आंचलिक बोली की सबसे बेहतरीन रचना है. कुमाऊनी सामाजिक परिप्रेक्ष को लेखक ने जैसे कागज़ पे उकेर कर जीवंत कर दिया है. उदहारण के तौर पर ये देखिये किसी नव अवंतुक के परिचय का तरीक़ा, “कौन हुए’ का सपाट सा जवाब परिष्कृत नागर समाज में सर्वथा अपर्याप्त माना जाता है। यह बदतमीजी की हद है कि आप कह दें कि मैं डीडी हुआ। आपको कहना होगा, न कहिएगा तो कहलवा दिया जाएगा, मैं डीडी हुआ दुर्गादत्त तिवारी, बगड़गाँव का, मेरे पिताजी मथुरादत्त तो बहुत पहले गुजर गए थे, उन्हें आप क्या जानते होंगे, बट परहैप्स यू माइट भी नोइंग बी.डी तिवारी,वह मेरे एक अंकल ठहरे…..वे मेरे दूसरे अंकल ठहरे। उम्मीद करनी होगी कि इतने भर से जिज्ञासु समझ जाएगा। ना समझा तो आपको ननिहाल की वंशावली बतानी होगी।’ वैसे उपन्यास इस बात से भी पाठकों को इंगित कराती है की भाषा चाहे कोई भी हो, भावनाओं के सम्प्रेषण में कभी बाधक नहीं बनतीं.. उपन्यास में वह प्रसंग जहाँ नायक नायिका को पत्र लिखता है, पर नायिका उनको इतना गूढ़ पाती है की वो पत्र अपने पिता को दे देती है, की पढ़ें और उसे समझाएं की उसके प्रेमी ने आखिर लिखा क्या है! अब ऐसे प्रसंगों से आपके चेहरे पे मुस्कान आएगी ही.. और जब उसके पिता उसे नायक के पत्र समझते हैं, तो नायिका जवाब में लिखती है, ‘तू बहुत पडा लिखा है। तेरी बुद्धी बड़ी है। मैं मूरख हूँ। अब मैं सोच रही होसियार बनूँ करके। तेरा पत्र समझ सकूँ करके। मुसकिल ही हुआ पर कोसीस करनी ठहरी। मैंने बाबू से कहा है मुझे पडाओ।….हम कुछ करना चाहें, तो कर ही सकनेवाले हुए, नहीं? वैसे अभी हुई मैं पूरी भ्यास (फूहड़)। किसी भी बात का सीप (शऊर) नहीं हुआ। सूई में धागा भी नहीं डाल सकने वाली हुई। लेकिन बनूँगी। मन में ठान लेने की बात हुई। ठान लूँ करके सोच रही।’ वैसे ही जैसे की नायक नाइका अपने प्रेम के इज़हार करते हैं, ‘जिलेम्बू’ कहकर! कई शब्द सिर्फ शब्द न होकर प्रतीक हो गए हैं इस कहानी में, ‘मरगाठ’ क्या सिर्फ शब्द है, या एक मानसिक दशा?

जोशी जी की अन्य रचनाओं की तरह एक बात जो इस रचना में भी उभर कर आती है वो है मजबूत नारी चरित्र और लुंज पुंज पुरुष करैक्टर. बेबी भले ही खिलंदड़ हो, अल्हड़ हो, उसमे एक स्थिरता है. जब एक बार उसने ठान लिया की डी डी से ही करेगी व्याह, स्वीकार करेगी उसको उसकी हर कमी के साथ, तो फिर उसका इरादा टस से मस नहीं हुआ. नायक को दे दिया जनेऊ, और मान लिया पति गणानाथ के सामने, वो भी तब जब उसका विवाह किसी और से तै हो चूका था. सारे समाज से भिड़ गयी वो और करा ली अपनी बदनामी …. नायक जब परिवार की दुहाई देता है तो फुट पड़ते हैं ये बोल उसके मुख से, ‘झे मुझसे सादी करनी थी कि मेरे घरवालों से? मुझसे करनी थी तो मैं कह रही हो गई सादी। मेरी सादी के मामले में मुझसे ज्यादा कह सकने वाला कौन हो सकने वाला हुआ? मैंने अपनी दादी की सादी वाला घाघरा-आँगड़ा पहनकर माँग में गणानाथ का सिंदूर भरकर अपने इजा-बाबू, ददाओं-बोज्यूओं सारे रिश्तेदारों के सामने कह दिया उसी दिन गरजकर : मेरी हो गई उस लाटे से सादी। कोई उस पर हाथ झन उठाना। कोई उसे गाली झन देना। तब उन्होंने कहा ठहरा : बच्चों का खेल समझ रखा सादी? अब तू भी वही पूछ रहा ठहरा।’ इसके बरक्श नायक हर समय दुविधा में ही दीखता है, आत्म प्रवंचना और आत्म संदेह से ग्रसित. कई बार उपन्यास पढ़ते समय ऐसा लगा की उसे झगझोरूँ और पूछूं की अबे तू चाहता क्या है बे? किस चीज़ की तलाश में अकारण बजे चला जा रहा है, भागे जा रहा है. ज़िन्दगी तुझे ठहराओ देना चाह रही है, और तू है के.. मुक़म्मल जहाँ मिलता नहीं है किसी को, उन्ही कमियों में मुक़म्मलता तलाशनी पड़ती है!

एक और चीज़ जो उभर कर सामने आती है वो है १९५० के दशक का भारतीय समाज. आज़ादी के बाद होती तब्दीलियां. आधुनिकता धीरे धीरे पैर पसार रही थी, सामाजिक परिवर्तन धीरे धीरे हो रहा था. एक और चीज़ जो उभर कर सामने आती है वह है, सामाजिक परिप्रेक्ष में सफलता का मयार … आईएएस अधिकारी बनना भारत में उस समय शायद सफलता और कुलीन होने का सबसे बड़ा पैमाना माना जाता था….नेहरुवियन भारत में अर्थ पैदा करने वालों की शायद उतनी पूछ नहीं थी, जितनी की अर्थ को व्यवस्थित और रेगुलेट करने वालों की. बेबी की जुबां में कहें तो ‘घोड़े की जीन’ (इसका कॉन्टेक्स्ट तो पाठक समझ ही गए होंगे) पर चाबुक चलनेवालों की पूछ घोड़े से कहीं ज़्यादा थी.

और अंत में, इस किताब के कॉन्टेक्स्ट और बैकग्राउंड को और अच्छे से समझना हो तो मेरे सहपाठी प्रभात रंजन की नवीनतम पुस्तक ‘पालतू बोहेमियन’  पढ़िए!

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